पंकज बांकीरा ने पोटो हो, बिरसा मुंडा और रानी गाइदिन्ल्यू के संघर्षों से कराया रूबरू, राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित रबिन्द्र गिलुवा ने साझा की अपनी प्रेरणादायक जीवन यात्रा
चक्रधरपुर। जनजातीय समाज के गौरवशाली इतिहास, संस्कृति और स्वतंत्रता संग्राम में आदिवासी वीरों के अतुलनीय योगदान से नई पीढ़ी को परिचित कराने के उद्देश्य से पीएम श्री केंद्रीय विद्यालय, चक्रधरपुर में विशेष शैक्षणिक संवाद कार्यक्रम का आयोजन किया गया। 1 नवंबर से 15 नवंबर तक मनाए जा रहे राष्ट्रव्यापी जनजातीय गौरव पखवाड़ा के तहत आयोजित इस कार्यक्रम में विद्यार्थियों को आदिवासी स्वतंत्रता सेनानियों के संघर्ष, बलिदान और सामाजिक योगदान की जानकारी दी गई।
कार्यक्रम में चक्रधरपुर के आदिवासी युवा समाजसेवी, शोधकर्ता और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने विद्यार्थियों के साथ संवाद किया। वक्ताओं ने ऐतिहासिक तथ्यों और अपने व्यक्तिगत अनुभवों के माध्यम से बच्चों को न केवल आदिवासी इतिहास से परिचित कराया, बल्कि अपनी संस्कृति, परंपरा और पहचान पर गर्व करने का संदेश भी दिया।
पोटो हो से बिरसा मुंडा तक, वीर योद्धाओं की गाथा सुनकर प्रेरित हुए विद्यार्थी
कार्यक्रम के पहले सत्र में युवा वक्ता पंकज बांकीरा ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में आदिवासी वीरों की भूमिका पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ आदिवासी समाज ने अलग-अलग क्षेत्रों में किस प्रकार संगठित होकर संघर्ष किया और अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया।
उन्होंने कोल्हान के महान स्वतंत्रता सेनानी पोटो हो के नेतृत्व में हुए हो विद्रोह और अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष की जानकारी दी। इसके अलावा धरती आबा भगवान बिरसा मुंडा के उलगुलान, पूर्वोत्तर भारत की वीरांगना रानी गाइदिन्ल्यू, टंट्या भील, भीमा नायक, अल्लूरी सीताराम राजू, कोमाराम भीम, यू तिरोत सिंह, वीर नारायण सिंह और लक्ष्मण नायक जैसे महान स्वतंत्रता सेनानियों के योगदान को विद्यार्थियों के सामने रखा।
पंकज बांकीरा ने विशेष रूप से रानी गाइदिन्ल्यू के साहस और संघर्ष का उल्लेख करते हुए कहा कि जिस उम्र में आज के बच्चे पढ़ाई और खेलकूद में व्यस्त रहते हैं, उस छोटी उम्र में रानी गाइदिन्ल्यू ने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ संघर्ष का रास्ता चुना था। उनके इस प्रसंग ने विद्यार्थियों को काफी प्रभावित किया।
राष्ट्रपति पुरस्कार विजेता रबिन्द्र गिलुवा ने सुनाई संघर्ष से सफलता तक की कहानी
कार्यक्रम के दूसरे सत्र में सामाजिक कार्यकर्ता, शोधकर्ता एवं डिजिटल क्रिएटर रबिन्द्र गिलुवा ने विद्यार्थियों के साथ अपनी जीवन यात्रा साझा की। उन्होंने बताया कि किस प्रकार कठिन परिस्थितियों के बावजूद निरंतर मेहनत, अनुशासन और सामाजिक प्रतिबद्धता के माध्यम से उन्होंने अपनी पहचान बनाई।
उन्होंने अपने स्कूली जीवन में स्काउट्स एवं गाइड्स आंदोलन से जुड़ने और वर्ष 2014 में राष्ट्रपति पुरस्कार (राष्ट्रपति स्काउट) प्राप्त करने की उपलब्धि के बारे में बताया।
रबिन्द्र गिलुवा ने वर्ष 2017 से आदिवासी समाज के अधिकारों, शिक्षा, स्वास्थ्य और संस्कृति के संरक्षण के लिए किए जा रहे कार्यों की जानकारी भी दी। वे आदिवासी युवा मित्र मंडल में सचिव के रूप में सक्रिय हैं तथा कोल्हान नीतिर तुरतुंग और कोल्हान सेमिनार के संस्थापक सदस्यों में शामिल हैं।
स्वास्थ्य सेवा के क्षेत्र में उनके योगदान की जानकारी देते हुए बताया गया कि उन्होंने 'डोनेट ब्लड : बी ए हीरो' मोबाइल ऐप और सामुदायिक नेटवर्क की स्थापना की है। वे अब तक 31 से अधिक बार रक्तदान कर चुके हैं और आपातकालीन परिस्थितियों में एक हजार से अधिक लोगों को रक्त उपलब्ध कराने में सहयोग कर चुके हैं।
डिजिटल मीडिया के माध्यम से भी वे आदिवासी समाज के मुद्दों को सामने ला रहे हैं। 'आदिवासी इनसाइट्स' और 'झारखंड्स लाइफ' जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए वे आदिवासी अधिकारों, संस्कृति और जमीनी समस्याओं पर जागरूकता फैलाते हैं। वर्तमान में वे संवाद फेलोशिप के तहत हो आदिवासियों के पारंपरिक गोत्र यानी किलि और उपनाम पर शोध कर रहे हैं।
आदिवासी इतिहास और संस्कृति को जानने का दिया संदेश
कार्यक्रम के समापन पर दोनों वक्ताओं ने विद्यार्थियों और शिक्षकों से 'Adivasi Lives Matter' वेबसाइट का अवलोकन करने तथा 'Adivasi Insights' और 'Jharkhand's Life' डिजिटल पेजों को फॉलो करने की अपील की। उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज के इतिहास, जीवनशैली, परंपराओं और वर्तमान चुनौतियों को समझना नई पीढ़ी के लिए बेहद जरूरी है।
विद्यालय के छात्र-छात्राओं एवं शिक्षकों ने इस ज्ञानवर्धक संवाद की सराहना की। कार्यक्रम के बाद दोनों वक्ताओं ने आगामी शनिवार को पोटका केंद्रीय विद्यालय में भी विद्यार्थियों के साथ इसी तरह का संवाद आयोजित करने की योजना बनाई।
साथ ही भविष्य में केंद्रीय विद्यालय के विद्यार्थियों को शैक्षणिक भ्रमण, सांस्कृतिक अध्ययन और व्यावहारिक मार्गदर्शन के माध्यम से सहयोग देने का भरोसा दिलाया।
यह आयोजन विद्यार्थियों को इतिहास की किताबों से आगे बढ़कर आदिवासी समाज के वास्तविक नायकों, उनके संघर्ष और बलिदान से जोड़ने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल साबित हुआ।
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